
यह आरक्षण तमिलनाडु से भी ज्यादा हो गया है। हालांकि तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई की सीमा से पहले का है। दूसरी तरफ, आरक्षण की अधिकतम 50 फीसदी की सीमा से आगे बढ़कर आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं इस पर संविधान विशेषज्ञ बंटे हुए हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट जरूर पहुंचेगा और राज्य सरकार ने इसकी तैयारी कर ली है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैवियट दाखिल दी है और आग्रह किया है कि फैसले को चुनौती देने वाला कोई भी आदेश सरकार को सुने बिना न दिया जाए।हालांकि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला (इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1993 जिसे मंडल फैसला भी कहा जाता है) जिसमें यह सीमा तय की गई थी उसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 50 फीसदी की सीमा से आगे बढ़ा जा सकता है यदि उसके लिए आपात परिस्थितियां, सामाजिक और आथिर्क रूप से पिछड़ेपन का समकालीन सांख्यीकिय डाटा मौजूद हो जिसमें सेवाओं में समुदाय के पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अभाव दिखता हो लेकिन इसके देने से प्रशासन की क्षमता / कार्यकुशलता प्रभावित न होती हो।सरकार का तर्क रहा है कि मराठाओं को पिछले सात दशकों से आरक्षण से मनमाने रूप से वंचित रखा गया है जबकि वे राज्य की 33 फीसदी आबादी हैं और मुख्यत: कृषि कार्य में लिप्त हैं। आत्महत्या करने की दर उनमें सबसे ज्यादा है। यह उनके लिए एक आपात और असाधारण परिस्थिति है जिसके आधार पर आरक्षण दिया जा सकता है। इससे 50 फीसदी की सीमा भी लंघ जाए तो कोई बात नहीं क्योंिक असाधारण परिस्थितियां मौजूद हैं।पूर्व अटार्नी जरनल तथा संविधान विशेषज्ञ मुकुल रोहतगी ने कहा कि आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा नियम नही है। जस्टिस जीवन रेड्डी ने स्पष्ट किया है कि इसे तोड़ा जा सकता है यदि राज्यके पास आपात स्थिति और पिछड़ेपन का आंकड़ा मौजूद हो। इस मामले में गायकवाड़ आयोग ने आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा पिछड़ेपन के मुख्य हेडों के तहत 25 मानकों पर विस्तृत सर्वे किया है जबकि मंडल आयोग ने सिर्फ 11 मानकों पर ही अध्ययन किया था। गायकवाड़ आयोग ने 1,92,522 लोगों की सुनवाई की और आंकड़ा एकत्र किया। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि डाटा मौजूद नहीं है।वहीं, आरक्षण के विरोध में जानकारों ने कहा कि राज्य में यह एक तथ्य है कि महाराष्ट्र में 18 मुख्यमंत्रियों में 11 मुख्यमंत्री मराठा समुदाय से रहे हैं। ऐसे में इस समुदाय को 50 फीसदी की सीमा से ज्यादा आरक्षण देकर बाहर नहीं जा सकता। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण : 12 फीसदी नौकरियों में और 13 फीसदी शिक्षा में (कुल 70 फीसदी)
तमिलनाडु : 69 फीसदी
हरियाणा : 67
राजस्थान : 54
मध्यप्रदेश : 63
आंध्र प्रदेश : 62
तेलंगना : 55
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