नजरिया. पीएम मोदी से लेकर सीएम कमलनाथ तक अपनी सरकार को लेकर आश्वस्त हैं, अभी कौनसे चुनाव हैं, जो राजनीतिक रस्साकशी की परवाह करें?
सियासी सयानों का मानना है कि यदि जनता को लगता है कि दिल्ली का चुनाव हार जाने से पीएम मोदी टीम के माथे पर चिंता की रेखाएं उभर आएंगी, तो यह भ्रम त्याग दें!
राजनेता केवल अपने चुनाव वर्ष में ही जनप्रिय चेहरा लिए नजर आते हैं, शेष समय तो जो औरों को विकास का ज्ञान बांटते हैं, वह सब जानते हैं?
लोकसभा चुनाव से पहले महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे को मनाने कई बार अमित शाह ने प्रयास किए, पीएम मोदी ने केन्द्र में सत्ता हांसिल की, उसके बाद से मनाने का अध्याय बंद है? महाराष्ट्र सीएम पद के सत्ता संघर्ष में एक बार भी उन्होंने उद्धव ठाकरे को मनाने का प्रयास नहीं किया, कोई सीएम होवे, हमें का हानि?
इधर, एमपी में कमलनाथ और कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच राजनीतिक खींचतान जारी है, जो कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी तक भी पहुंची, लेकिन इसका कोई ठोस नतीजा निकलेगा, ऐसी उम्मीद बेमतलब है?
खबरों की माने तो दिल्ली में सरकार और संगठन के बीच आपसी समन्वय को मजबूत बनाने के लिए मध्य प्रदेश कांग्रेस ने बैठक रखी गई थी, लेकिन जहां सिंधिया बैठक को बीच में छोड़कर चले गए, वहीं कमलनाथ भी इन सब बातों से बेफिक्र नजर आए दिलचस्प बाद यह है कि बैठक खत्म होने के बाद जब उनसे सिंधिया के सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की घोषणा को लेकर प्रेस-प्रश्न किया गया, तो उनका जवाब था- तो उतर जाएं!
हालांकि, एमपी के नए सियासी समीकरण के मद्देनजर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं, लेकिन होगा क्या? यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं होगा! एमपी की बात हो और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह खामोश रहें, ऐसा तो हो नहीं सकता, लिहाजा उन्होंने प्रेस से कहा- पूरी कांग्रेस पार्टी सिंधियाजी के साथ है. हम सबने घोषणापत्र में मिलकर वादे किए थे. पांच वर्षों में कमलनाथजी सभी वादों को पूरा करेंगे, और ज्यादातर वादों पर काम तेजी से चल रहा है!
अप्रत्यक्ष राजनीतिक कारण तो सिंधिया जाने, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों के अनुसार किसानों के कर्ज माफ, गेस्ट शिक्षकों को नियमित नहीं किए जाने आदि के कारण वे नाराज हैं. इसी संदर्भ में उन्होंने कहा भी था कि- वादे पूरे नहीं हुए तो वो कमलनाथ सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे?
इसका जवाब भी हाजिर है- घोषणा-पत्र में पांच साल के लिए वादे किए गए हैं, पांच महीने में पूरे करने के लिए नहीं!
सियासी सयानों का मानना है कि अगले चुनाव तक यह सब चलता रहेगा, इसलिए मजे से सियासी सिनेमा देखते रहें?
Manthan News Just another WordPress site