विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
2018 में आसन्न चुनावों को लेकर जिस तरह के कयास, म.प्र. में कॉग्रेस के प्रदर्शन को लेकर लगाये जा रहे थे। अब उन पर विराम लगना तय है। जिस तरह से कॉग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने रण कौशल का प्रदर्शन कर 6 जून को मंदसौर में विभिन्न समितियों के माध्यम से कॉग्रेस नेताओं की जबावदेही तय कर मंच से ही सिंधिया और कमलनाथ की जोड़ी अनुभव और जनाधार के रुप में स्पष्ट की है। उससे लगता है कि अब न तो कॉगे्रस, न ही कॉग्रेस कार्यकत्र्ता और न ही म.प्र. के आत्महत्या करते किसान पीडि़त, वंचितों में कॉग्रेस नेतृत्व को लेकर कोई संशय रह गया है।
देखा जाये तो मंदसौर की महारैली और अन्नदाताओं के पक्ष में राहुल की इस हुंकार ने यह साफ कर दिया कि अगर प्रदेश में 2018 में कॉग्रेस की सरकार बनी तो किसानों के समस्त रिण, कर्ज 10 दिन के अन्दर माफ कर दिये जायेगेंं और गांव विकासखण्ड स्तर से लेकर जिला स्तर तक बेरोजगारों के लिए रोजगार के संसाधन माध्यम उपलब्ध कराये जायेगें। इतना ही नहीं राहुल ने मंच से एक मर्तवा नहीं दो-दो मर्तवा सिंधिया कमलनाथ का नाम लेकर उन्हें अनुभव और मेहनत के आधार पर जनसमस्याओं के निदान हेतु जबावदेह भी ठहराया। उन्होंने सिंधिया युवा है, ऊर्जावान है और कमलनाथ समर्थ व सक्षम है जैसे शब्द भी दोहरायें।
इससे साफ है कि कॉग्रेस आलाकमान राहुल गांधी ने छवि जनाधार के आधार पर कॉग्रेस के पक्ष में जनाधार बढ़ाने सिंधिया को स्वच्छ छवि और ऊर्जावान नेता के रुप में प्रस्तुत किया। वहीं कमलनाथ के अनुभव और सामर्थ पर भरोसा भी जताया। ऐसे में देखना होगा कि विगत 10 वर्षो से ग्वालियर-चम्बल से लेकर महा कौशल मालवा तक और विर्धव रोहेल, वघेलखण्ड से लेकर बुन्देलखण्ड सहित निमाण की खाक छानने वाले सिंधिया और अपने लम्बे राजनैतिक अनुभव और सामर्थ के सहारे कॉग्रेस कांरवा को आगे ले जाने वाले म.प्र. के इन कॉग्रेस नेताओं की जोड़ी 2018 की विजयी सुनिश्चित करने क्या रणनीत अपनाती है। जिसको लेकर, विगत 14 वर्ष से सत्ता सुख भोग रही भाजपा भी सकते में है। और उसने भी अपनी रणनीत में बदलाव करते हुए फिलहाल अपने पत्ते नहीं खोले है।
मगर चौथी मर्तवा म.प्र. की सत्ता हथियाने तैयारी पूरी कर छोड़ी है। अगर खबरों की माने तो भाजपा आलाकमान अमितशाह भी 2019 के मद्देनजर कोई जोखिम उठाने के मूड में नहीं है। सो उन्होंने म.प्र. की कमान अब स्वयं अपने हाथों में ले नई रणनीत पर काम करना शुरु कर दिया है। अगर चुनाव लोकसभा, विधानसभा के साथ हुए तो भाजपा के मिशन 2019 को बड़ा नुकसान हो सकता है। और लोकसभा, विधानसभा अलग-अलग हुए तो भाजपा को सिर्फ कूट नीति का ही सहारा लेना होगा जिससे उसका मिशन 2019-300 के पार हो सके और यह तभी संभव है जब भाजपा आलाकमान का लक्ष्य 2019 को लेकर निर्धारित हो, बहरहाल राजनीति है राजनीति का क्या, राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता।
जहां तक सिंधिया का सवाल है तो म.प्र. के अन्दर उनकी छवि, आम पीडि़त, वंचित, मजदूर किसानों के बीच एक ईमानदार और मेहनतकस संघर्षशील नेता के रुप में है। जो सिर्फ और सिर्फ जीवन मूल्य, सिद्धान्तों और जनकल्याण प्रदेश कल्याण के लिए निष्ठा ईमानदारी से राजनीति के पक्षधर रहे है। वे मौके वे मौके मंच से भी, कई मर्तवा यह भी दोहराते रहे है जन राष्ट्र, सेवा, कल्याण और विकास के लिए सभी को एक होकर जनता के लिए कार्य करना चाहिए न कि राजनीति।
बहरहाल जो भी हो, जिस तेजी से विश्वास के साथ सिंधिया ने आलाकमान का विश्वास और प्रदेश के नेताओं का साथ मिल रहा है। अगर यहीं जुगलबंदी कॉग्रेस में बनी रही तो भाजपा का म.प्र. मिशन 2018 इतना आसान नहीं होगा। क्योंकि भाजपा के सामने इस मर्तवा धर्म, जाति, क्षेत्र विशेष से परे नेतृत्व और जीवन मूल्य, सिद्धान्तों की राजनीति करने वाला ऐसा चेहरा होगा जिसकी रात 2 बजे तो सुबह 6 बजे हो जाती है, 9 बजे अगर काफिला चला तो फिर वापसी रात 12 बजे ही हो पाती है।
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