दिल लगाते ही क्यूं हो
वेवजह जज्बातों को जगाते ही क्यूं हो,,
गर यकीन नहीं था मुझमें तो दिल लगाते ही क्यूं हो,,
जब आकर चले जाना फितरत में था तेरी,,
तो वेवजह यादों में आते ही क्यूं हो,,
अपना नहीं सकते जिसे ता उम्र के लिए,,
उसे जमाने से अपना बताते ही क्यूं हो,,
जिन रिश्तो को समेटना आता नहीं तुम्हें,,
तो मेरे रिश्ते को आजमाते ही क्यूं हो,,
जब वजह दे नहीं सकते मुस्कुराने की,,
तो खामखां इस तरह रुलाते ही क्यूं हो,,
मधु शर्मा “बावली”
सतना ( मध्य प्रदेश)
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