वफादारी का ईनाम जरूर मिलता है, कहने-सुनने में यह भले ही फिल्मी लाइन लगे लेकिन कभी-कभार चौंकाते हुए सही साबित होती है. अगर किसी को इस बात में कोई शक हो तो उसे श्याम कुमार के बार में जरूर जानना चाहिए. पिछले साल मोबाइल वॉलेट कंपनी सिट्रस पे को पेयू ने खरीदा था. पेयू मूल रूप से दक्षिण अफ्रीका की एक कंपनी की भारतीय सहायक कंपनी है. मुंबई स्थित सिट्रस के कर्मचारियों को इस सौदे से लाखों रुपये मिले हैं और दिलचस्प बात है कि कंपनी के सबसे छोटे कर्मचारी तक, जो 2010 में इसकी शुरुआत से साथ हैं, आज लखपति बन गए हैं.
श्याम इन्हीं कर्मचारियों में से हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले श्याम के पिता ने जब टीबी के चलते अचानक खाट पकड़ ली तो उनके सिर पर जिम्मेदारी आ गई कि वे भी तुरंत कोई काम-धंधा ढूंढ़ें, और अपने परिवार की मदद करें. लेकिन स्कूली पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाए श्याम के लिए यह इतना आसान नहीं था. तब उनके छोटे भाई मुंबई में ही एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी के यहां ड्राइवरी कर रहे थे. उन्होंने श्याम की नौकरी के लिए इसी अधिकारी की मदद मांगी.
सिट्रस के संस्थापक जितेंद्र गुप्ता इस बैंक अधिकारी के दोस्त हैं. अपने दोस्त की सिफारिश पर आखिरकार जितेंद्र ने श्याम को 8000 रुपये की पगार पर अपने ऑफिस में चपरासी की नौकरी दे दी. इस तरह वे इस स्टार्टअप के शुरुआती कर्मचारी भी बन गए. जितेंद्र ने अपने कर्मचारियों को – एंप्लाई स्टॉक ओनरशिप प्लान यानी ईसॉप के जरिए शेयर देने का प्रस्ताव भी दिया था. श्याम तब तो इसके बारे में ज्यादा नहीं समझते थे लेकिन उन्हें लगा कि लंबे वक्त में इसका फायदा मिल सकता है तो वे इसके लिए तैयार हो गए. वे बताते हैं, ‘उन्होंने (जितेंद्र) कहा कि यह बहुत अच्छी चीज है. मुझे आगे जाकर इसका फायदा मिलेगा. यह सुनकर मैं बहुत खुश था.’
भारत में स्टार्टअप क्रांति की एक अलग कहानी जिसमें सबसे छोटा कर्मचारी भी लाखों का मालिक बन गयाश्याम की यह खुशी तब जमीन पर उतर आई जब छह साल बाद पेयू ने सिट्रस को 13 करोड़ डॉलर में खरीद लिया. इसके साथ ही श्याम कुमार के शेयर की कीमत 75 हजार डॉलर यानी 50 लाख रुपये हो गई. स्टार्टअप कंपनियों की इस तरह की खरीद-बिक्री में अमूमन मालिक और बड़े कर्मचारियों के अचानक अमीर बनने की खबरें आती रहती हैं लेकिन यहां सबसे निचले दर्जे का एक कर्मचारी भी लखपति बन गया था. श्याम ने जब यह बात अपनी पत्नी को बताई तो उन्हें इस पर भरोसा ही नहीं हुआ. लेकिन जब पिछले साल नवंबर में तकरीबन 26 लाख रुपये उनके अकाउंट में आया तो फिर इस दंपति के पास यह न मानने की कोई वजह नहीं थी कि वे लखपति बन चुके हैं.
इस रकम ने श्याम की जिंदगी कई मायनों में बदल दी. अब वे बहुत अच्छा स्मार्टफोन इस्तेमाल करने लगे हैं. परिवार के सभी सदस्यों का उन्होंने स्वास्थ्य बीमा करवा लिया है. वे पिछले छह साल से अपने परिवार के 10 सदस्यों के साथ 100 वर्ग फुट की एक झुग्गी में रह रहे थे. लेकिन अब वे मुंबई के बाहरी इलाके में एक घर लेने की योजना बना रहे हैं. कहानी उतनी फिल्मी भले न हो लेकिन श्याम इस बात को सही साबित करने वाले सटीक उदाहरण हैं कि वफादारी का ईनाम जरूर मिलता है.