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लड़की हूं .. लड़का नहीं,, ना मारो मुझे ये सोच कर,,

कहता है भ्रूण सबसे,,,,
लड़की हूं .. लड़का नहीं,,
ना मारो मुझे ये सोच कर,,
मै तो हूं प्यार तुम्हारा , दो रिश्तों का एहसास तुम्हारा,,
मै बोझ नहीं , मै हूं इकरार तुम्हारा,,। ना मारो मुझे यूं कोख मै , मुझे जीना है संसार तुम्हारा,,

कहता है भ्रूण सबसे,,,,
लड़की हूं .. लड़का नहीं,,
ना मारो मुझे ये सोच कर,,

मै हूं अंश तुम्हारा , ना करो ऐसे तिरस्कार हमारा,,
मै हूं वंश तुम्हारा , ना करो ऐसे बहिष्कार हमारा,,
आने दो मुझे इस जहां में लड़की होकर नाम करूंगी,,
ना मारो मुझे ,तुम्हारी ज़िन्दगी की शान बनूंगी,,
मेरी मां मुझसे क्यों है इतना डर,,
हर,। लूंगी मै भी तुम्हारे हर दुख दर्द,,

कहता है भ्रूण सबसे,,,,
लड़की हूं .. लड़का नहीं,,
ना मारो मुझे ये सोच कर,,

मुझ पर विश्वास नहीं , खुद पर तो विश्वास करो,,
आने तो मुझे इस दुनिया में , तुम अपना प्रेम साकार करो,,
ना होगी बेटी तो बहू कहां से लाओगे,,
राखी, दौज़,सारे त्यौहार तुम कैसे मनाओगे,,
माता का पूजन कर कन्या किसे खिलाओगे,,
मां,बहन,बेटी,भाभी सारे रिश्ते कहां से लाओगे,,
इस दुनियां को आगे कैसे बढ़ाओगे,,
बतलाओ मुझे बेटी बिना संसार कैसे चलाओगे,,
प्रज्ञा शिवहरे “शिवज्ञा”
शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

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