नर्सिंग ऑफिसर भर्ती में जेंडर के आधार पर भेदभाव क्यों? हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार से पूछा सवाल
नर्सिंग ऑफिसर की नियुक्ति में महिलाओं को शत प्रतिशत आरक्षण दिए जाने को दी गई चुनौती, पुरुष अभ्यर्थियों ने दायर कराई थी याचिका.
जबलपुर :नर्सिंग ऑफीसर भर्ती में महिलाओं के आरक्षण के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट की मुख्य खंडपीठ जबलपुर में सौ फीसदी आरक्षण दिए जाने के खिलाफ याचिका दायर की गई थी. इस मामले में जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए सरकार से पूछा है कि जेंडर के आधार पर भेदभाव क्यों किया जा रहा है?
पुरुष अभ्यर्थियों ने दायर कराई थी याचिका
याचिकाकर्ता संतोष कुमार लोधी सहित कई अन्य पुरुष अभ्यर्थियों ने दायर याचिका में नर्सिंग ऑफिसर के भर्ती विज्ञापन को चुनौती दी है. याचिका में कहा गया था कि कर्मचारी चयन मंडल द्वारा 2 अप्रैल 2026 को जारी विज्ञापन (नर्सिंग ऑफिसर एवं सिस्टर ट्यूटर भर्ती परीक्षा-2026) में नर्सिंग ऑफिसर के सौ प्रतिशत पद केवल महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित किए गए हैं. इससे योग्य पुरुष अभ्यर्थी आवेदन करने से पूरी तरह वंचित हो गए हैं.
जेंडर के आधार पर भेदभाव का दिया हवाला
मध्य प्रदेश चिकित्सा शिक्षा (अराजपत्रित) सेवा भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2023 के तहत नर्सिंग ऑफिसर के पद के लिए कोई लिंग-आधारित प्रतिबंध नहीं है. मेडिकल कॉलेजों में नर्सिंग ऑफिसर के भर्ती विज्ञापन में किया गया यह प्रावधान वैधानिक नियमों के विपरीत है. तर्क दिया गया है कि पुरुष और महिला दोनों एक ही पाठ्यक्रम (बीएससी नर्सिंग/जीएमएम) पढ़ते हैं और उनके पास समान योग्यता व पंजीकरण होता है. जेंडर के आधार पर सार्वजनिक रोजगार से पूर्णतः बाहर करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन है.
याचिका में राहत चाही गई थी कि विज्ञापन के उस हिस्से को निरस्त किया जाए जो 100 प्रतिशत पदों को महिलाओं के लिए आरक्षित करता है. इसपर जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने सरकार से पूछा है कि जेंडर के आधार पर भेदभाव क्यों किया जा रहा है? याचिका पर अगली सुनवाई 15 अप्रैल को होगी. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विशाल बघेल ने पैरवी की.
अपराधिक प्रकरण में चार्ज तय करने के आदेश बिना सोचे-समझे जारी नहीं किये जा सकते
वहीं, एक अन्य मामले में हाईकोर्ट जस्टिस डीडी बसंल की एकलपीठ ने अपने अहम आदेष में कहा है कि अपराधिक प्रकरण में चार्ज तय करने के आदेश बिना सोचे-समझे जारी नहीं किए जा सकते. अदालत को चार्जशीट और पेश किए गए दस्तावेज की जांच कर न्यायिक सोच का इस्तेमाल करते हुए यह पता लगाना होगा कि आरोपी के खिलाफ प्रकरण अभियोजन लायक है या नहीं. ट्रायल कोर्ट चार्ज तय करते समय विस्तृत कारण बताने मजबूर नहीं है, परंतु यह उल्लेख करना आवश्यक है कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री के आधार पर अपनी राय बनाई है. मामला भोपाल के बैरसिया थानान्तर्गत युवती की शिकायत पर बीएनएसएस की धारा 69,351 3 व 3 5 के तहत अपराधिक प्रकरण से जुड़ा हुआ है, जिसमें याचिकाकर्ता ने आपराधिक क्रिमिनल रिवीजन दायर की थी.
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