विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिन्दो को छोड़ गड़े मुद्दों पर ल_म, ल_ा अब तो मानों भारतीय राजनीति और दलों की नियती सी बन बन गई है। देश के बेहाल गांव, गली को छोड़, जिस तरह से स्वयं के अहम, अहंकार सत्ता के लिए राष्ट्र-जनसेवा के नाम जिस तरह से चीथपुकार मची है। उसे देखकर तो यहीं कहा जा सकता है कि गांव, गली, राष्ट्र जन की समृद्धी खुशहाली की आखिरकार परवाह किसे। देश में बढ़ती अनियंत्रित जनसंख्या और सिकुड़ते संसाधन, संस्कार विहीन होते समाज से आखिर राष्ट्र जन को क्या हासिल होगा समझने वाली बात है।
आज जिस राष्ट्र जनकल्याण के नाम विगत 70 वर्षो से जो भीषण संघर्ष सत्ता या सत्ता को लालहित लोगों के बीच छिड़ा है उसके परिणाम स्वरुप वैचारिक या व्यक्ति तौर पर कुछ प्रमाण अवश्य देखे जा सकते है। मगर विगत 70 वर्षो में राष्ट्र-जनकल्याण या गांव, गली का कोई स्वीकार्य स्पर्शी ढांचा स्थापित हुआ हो इसमें आज भी संशय है। अगर 1977, 1984 और 2001 से 2007 और अब 2014 के दौर को छोड़ दे तो शेष दिनो में ऐसा एक भी उल्लेखनीय कार्य नहीं हो सका। जिसकी चर्चा गर्व के साथ की जा सके। इन वर्षो के दौरान रही सत्ताओं से कुछ भूले हुई तो राष्ट्र जन के हित में कुछ ऐतिहासिक कार्य भी हुये। जिनकी चर्चा बजाये गढ़ें मुद्दों के अखाडऩे के राष्ट्र के सामने अवश्य होनी चाहिए।
मगर दुर्भाग्य कि सत्ता के लिए एक दूसरे की प्रतिष्ठा के प्यासे दल अब अहम अहंकार में यह स्वीकारने तैयार नहीं सिवाये एक दूसरे को नीचा दिखाने और एक दूसरे के नेताओं की वखिया उधेडऩे में जिनमें कुछ जिन्दा है। तो कुछ अब इस दुनिया में ही नहीं। जबकि आज चर्चा होनी थी लुटे-पिटे राष्ट्र में कृषि, ओद्योगिक विकास की,लोकतांत्रिक समाजवाद, हरितक्रान्ति, दुग्ध क्रान्ति, राजा जागीदार, सामंत, सूतखोरी समाप्ती सहित परमाणु आर्थिक लोकतांत्रिक ताकत की गांव, गली में स्थापित छोटी-छोटी सरकार, कम्प्यूटर व्हीकल, सड़क व्यापारिकक्रान्ति की,आतंक ही नहीं अलगांववादियों की समाप्ति की।
बात होनी थी देश में घटते संसाधन बढ़ती आबादी, बेरोजगारी के साथ प्रतिभा संरक्षण निर्माण की। मगर इस सबसे इतर जब धार्मिक, जातिगत, क्षेत्रीय उन्माद की अनियंत्रित अराजकता वंश, परिवार, वैचारिक उन्माद की अराजकता देश का आम भोले-भाला बैवस मजबूर नागरिक देखता है। सुनता है तो उसकी आशा-आकांक्षायें अपनी सत्ताओं से डोल जाती है और ऐसी सत्तायें फिर उस जनता के लिए अविश्वसनीय बन जाती है। अगर लोगों में ऐसे ही हालातों के चलते हमारे सम्माननीय, माननीय नेता, श्रीमान, नौकरशाहों का मान-सम्मान गड़े मुद्दों को उखाड़ ल_म-ल_ा करने वालो के प्रति नहीं बचा। और गांव, गली की आशा आकांक्षाओं का तिरस्कार यू ही सत्ता संग्राम में होता रहा तो कैसे हम समृद्ध खुशहाल राष्ट्र बन वह समृद्धि खुशहाली गांव, गली तक पहुंचा पायेगेंं। बेहतर हो हम विरासत से सीख देश ही नहीं, गांव, गली में राष्ट्र जन कल्याण के लिए अपनी त्याग-तपस्या, आचरण, व्यवहार, भाषा बोली से ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करे। जिससे हमे ही नहीं, हमारी आने वाली नस्ले स्वयं पर गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस कर पाये।
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