नरेंद्र मोदी जब 26 मई को प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो उनके 4,000 वीआइपी मेहमानों में उदय सिंह देशमुख (भय्यूजी महाराज) भी तशरीफ लाए थे. आम तौर पर बाबा लोग किसी मठ-मंदिर या श्रृद्धालु के घर टिकते हैं, लेकिन भय्यूजी दक्षिण दिल्ली के एंबेसडर होटल में ठहरे थे और कुछ चुनिंदा लोगों से मुलाकात के बाद अगले दिन इंदौर लौट गए. इस बार दिल्ली ने इस शख्स पर बहुत गौर नहीं किया, लेकिन जब पिछली बार 2011 में वे रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का अनशन तुड़वाने आए थे तो सबकी नजर उन पर थी.
यही नहीं, उस समय जेडी (यू) अध्यक्ष शरद यादव ने लोकसभा में जब अन्ना आंदोलन पर अपनी भड़ास निकाली तो भय्यूजी को भी खूब लपेटा था. उस समय लोगों ने पहली बार एक गोरे-चिट्टे, ऊंचे-पूरे हीरो की तरह दिखने वाले शख्स को एक साधु के रूप में देखा था. यह भारतीय आध्यात्मिक जगत का बिल्कुल नया कलेवर था. तलवारबाजी और घुड़सवारी में निपुण मराठा ने तब की यूपीए सरकार के एक मंत्री के बुलावे पर अण्णा को मनाने की कोशिश की थी.
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