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कवि इंजी. सोनू सीताराम धानुक “सोम” द्वारा लिखित “व्यंग्य” हां…. साहेब मुझे अच्छे दिन चाहिए , बुरे नहीं ,,,

(व्यंग्य)
हां…. साहेब मुझे अच्छे दिन चाहिए ,,, बुरे नहीं……

2 घंटे बिजली चाहिए ,24 घंटे नहीं,,,
दिन रात गरमी चाहिए , हवा बिजली नहीं,,,
250 ₹ किलो दाल चाहिए ,80/100₹ किलो नहीं,,,
गोबर चूल्हा लकड़ी चाहिए , एलपीजी नहीं,,,
लोटा लेकर खेत खलियान चाहिए , शौचालय नहीं,,,
हां…. साहेब मुझे अच्छे दिन चाहिए ,,, बुरे नहीं…

60₹ दिहाड़ी चाहिए , 300 ₹ नहीं,,,
200₹ कारीगिरी चाहिए , 700₹ नहीं,,,
2-5₹ में पंचर सही करनी है , 25-50 ₹ नहीं,,,
1-2₹ किलो सहकारी राशन चाहिए , 100 पेट्रोल नहीं,,,
24 बिजली उपयोग करनी है , बिल ज्यादा नहीं,,,
पानी बर्बाद करना है , अपासी बिल ज्यादा नहीं,,,
हां…. साहेब मुझे अच्छे दिन चाहिए ,,, बुरे नहीं…

सब्जी सस्ती चाहिए , किसान की लागत नहीं,,,
धनियां पुदीना मुफ्त चाहिए , किसान की व्यथा नहीं,,,
मोबाइल 2 जी चाहिए , डेटा 4 जी नहीं,,,
5₹/मिन कॉल रेट चाहिए , अनलिमिटेड नहीं,,,
“सरकारी” तनख्वाह 5000₹ महीना चाहिए , 50000₹ नहीं,,,
हां…. साहेब मुझे अच्छे दिन चाहिए ,,, बुरे नहीं…

जम्मू कश्मीर चाहिए , 370 नहीं,,,
हर जगह बॉम्ब ब्लास्ट चाहिए , देश की सुरक्षा नहीं,,,
आतंकी चाहिए , उनकी फांसी नहीं,,,
बाहरी शक्तियों के सामने देश झुका चाहिए , उठा हुआ नहीं,,,
तिरंगा पीछे चाहिए , आगे लहराते हुए नहीं,,,
देश की आंखे नीचे चाहिए , उठाए हुए नहीं,,,
हां…. साहेब मुझे अच्छे दिन चाहिए ,,, बुरे नहीं…

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