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राशी ने लिखी गाय की वेदना पर भावविभोर कर देने बाली कविता

“वेदना”
कहने को तो #गौमाता हूँ।

अपने ही मालिक के घर में “अनजान” हूँ।
न खाने का “ठिकाना” न रहने का “बसेरा”।
ठंड में ठिठुरन की “मौहताज” हूँ।
फिर भी “कलयुग” मैं “गौमाता” की परिभाषा हूँ।
दूध न दूँ तो खाने के लिए “मौहताज”” हूँ।
समय पर घर न आऊँ तो अपने बच्चे के प्यार में “मौहताज” हूँ।
साहब मेरे न सही मेरे “बच्चों” की सोचिए।
मैं तो चली जाऊँगी, लेकिन मेरे बच्चों को ही “पहचान दिला” दीजिये।
मेरे मालिक का नाम तो बता दीजिए जो न खाना देता,न जगह देता बस दूध निकाल मुझे सड़क पर छोड़ देता साहिब।
थोड़ा अहसान “गौमाता” न सही समझो पर एक मूक जानवर समझ ही मेरी “वेदना” को समझो साहिब।
– राशि सिंह गौर

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