भोपालः चुनावी साल है, ऐसे में मध्य प्रदेश सरकार हर छोटी छोटी चीजों का बारीकी से ध्यान रख रही है। वैसे तो प्रदेश सरकार हर तबके को साधने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती, लेकिन सरकार की एक बड़ी चिंता विरोधी सुर शांत कराना भी है। इसी के चलते प्रदेश के कर्मचारियों को लुभाने की हर मुमकिन कोशिश करने के बाद भी इनपर अंकुश ना लगा पाने पर सरकार ने अब इन आंदोलनकारियों पर सख्ती से पेश आने का मन बना चुकी है। सरकार के नज़रिये से इनमें सबसे बड़े आनदोलनकारी सहकारिता और बिजली कंपनियों के कर्मचारी है। इसके चलते सरकार ने इन्हें अत्यावश्यक सेवा कानून (एस्मा) के दायरे में ले लिया है। इस कानून के लागू होने के बाद अब यह लोग अपनी सेवाओं में ज़रा भी लापरवाही नहीं कर सकते। इसी की वजह से अब यह लोग कानूनी तौर पर अपनी सेवाओं को छोड़कर हड़ताल पर भी नहीं जा सकते।
सहकारी कर्मचारी अबनही कर सकेंगे हड़ताल
सहकारिता विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, इस कानून को इन कर्मचारियों पर लागू करने का मकसद यह है कि, इससे इनके द्वारा किए जाने वाले कार्य अवरुद्ध होने से बचाए जा सकते हैं। क्योंकि, पिछले दिनो अनाज खरीदी के मौके पर सहकारी बैंकों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे। ऐसे में किसानो का अनाज तो मंडियों में खरीद लिया गया था, लेकिन उन्हें किए जाने वाले भुगतान की राशि तय समय पर नहीं दी जा सकी थी। इससे किसानो को भी तय समय पर करम ना मिलने का नुकसान झेलना पड़ा था। वहीं कई जगहों पर समय पर पैसे ना मिलने की बेड न्यूज़ फैल जाने के कारण नियमित खरीदी भी प्रभावित हुई थी। इसे देखते हुए सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खरीदी के काम में लगे कर्मचारियों को एस्मा के दायरे में लाया गया है, ताकि इनके विरोध का असर दूसरों पर ना पड़े।
आमजन प्रभावित ना हो इसलिए लिया फैसला
वहीं, दूसरी तरफ ऊर्जा विभाग को भी इस कानून के अधीन लाने का कारण भी यही है। इस कानून के तहत छह बिजली कंपनियों के अधिकारियों, कर्मचारियों और अनुसचिवीय सेवा में लगे अमले को भी एस्मा के दायरे में लिया गया है। बता दें कि, बिजली कंपनी के कर्मचारी भी सरकार को सातवें वेतनमान समेत कुछ अन्य मांगों को लेकर हड़ताल पर जाने की चेतावनी दे चुके हैं। सरकार का मानना है कि, अगर बिजली कर्मचारी हड़ताल पर जाते हैं, तो इसका सीधा असर आम जन और कारोबार पर पड़ेगा। इससे विरोधी सुर भी बढ़ सकते हैं। इस कारण ही सरकार ने इस विभाग को भी एस्मा के दायरे में ले लिया है। हालांकि, यह कानून सितंबर 2018 तक या यूं कहें कि आचार संहिता लागू होने तक प्रभावी रहेगा। वहीं, अगर इसे आगे जारी रखने या समापत् करने की स्थिति जरूरत के हिसाब से तय की जा सकेगी।
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