“वेदना” कहने को तो #गौमाता हूँ। अपने ही मालिक के घर में “अनजान” हूँ। न खाने का “ठिकाना” न रहने का “बसेरा”। ठंड में ठिठुरन की “मौहताज” हूँ। फिर भी “कलयुग” मैं “गौमाता” की परिभाषा हूँ। दूध न दूँ तो खाने के लिए “मौहताज”” हूँ। समय पर घर न आऊँ …
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